मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024

कुलदेवी केशर माताजी

भारत में प्रत्येक हिन्दू परिवार में उनकी कुलदेवी माता होती है। तीज त्यौहार और विवाह के शुभ अवसर पर कुलदेवी माता की पूजा की जाती है। परिवार में नया सदस्य आने पर शक्ति की जात लगाई जाती है।माता के देवस्थान पर जा कर बच्चों के बाल उतारे जाते हैं।
अग्रवाल जाति की विभिन्न गोत्र की अलग- अलग शक्ति कुलदेवी माताजी हैं।
अग्रवाल जाति की गर्ग गोत्र में कुलदेवी केशरशक्ति माताजी के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इस ब्लॉग के माध्यम से अग्रवाल भाई-बंधु अपनी कुलदेवी माताजी के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें तो मैं अपना यह प्रयास सफल मानूँगी।
हमने कई जगह से जानकारी एकत्रित करके उसे समेटने का प्रयास किया है। पर फिर भी पूरी और सटीक जानकारी नहीं मिल पाई। केशर माताजी के भक्तगणों से अनुरोध है कि उन्हें कोई भी जानकारी पता हो तो हमें बताएं। यह ब्लॉग केशर माताजी के भक्तों की सहायता हेतु बनाया गया है। हो सकता हे, इसमें कुछ गलतियां और कमियां रह गयी हों। इसके लिए मैं क्षमाप्राथी हूँ।ब्लॉग पढ़ने वाले भक्तों से प्रार्थना है कि वे माताजी की आरती व  माताजी तक पहुंचने का रास्ता जानने हेतु ब्लॉग की अन्य पोस्ट भी पढ़ें।
       
         ।।बोलो जय शक्ति केशर माताजी की।।
केशर माताजी की प्रचलित कथा :-
राजस्थान में एक स्थान है, मनोहपुर। बहुत समय पहले वहां के दीवान थे- प्रकाश चंद्र गर्ग। पहले के समय में राजाओं के मध्य युद्ध आम बात हुआ करती थी। ऐसी ही युद्ध की संकट की घड़ी में दीवान प्रकाश चंद्र गर्ग अपने प्राण बचाते हुए म्हार कलां नामक छोटे गांव में पहुंच गए। उसी समय देवगढ़ के राजकुमार अपने विवाह के काफिले सहित उधर से लौट रहे थे। दीवानजी ने उनसे भेंट की और अपनी रक्षा करने की विनती की व शरण मांगी।राजकुमार ने क्षत्रिय धर्म निभाते हुए शरण में आये दीवानजी को शरण में लिया और उनके प्राणों की रक्षा करने का वचन दिया।
अचानक ही मनोहरपुर की सेना ने देवगढ़ के राजकुमार की सेना पर हमला कर दिया। राजकुमार के काफिले में ज्यादा सैनिक नहीं थे। युद्ध कुछ दिनों तक चलता रहा। लड़ते-लड़ते राजकुमार वीरगति को प्राप्त हुए। उसके पश्चात् रानी केशर कुंवर ने अपने पति के वचन की रक्षा हेतु तलवार उठाई और घोड़े पर सवार हो युद्ध किया। अंत में विजय रानी केशर कुंवर की हुई। तत्पश्चात् रानी ने अपने पति के शव के साथ शक्ति होने का निर्णय लिया।उन्होंने जौहर व्रत धारण किया और  पति का सिर अपनी गोद में रख चिता में प्रवेश किया। दीवानजी ने रानी केशर कुंवर के सामने हाथ जोड़ कर कहा -"माता! मेरे लिए क्या आदेश है?"  तब केशर कुंवर ने दीवानजी को कुल वृद्धि का आशीर्वाद दिया। दीवानजी ने शक्ति माताजी से कहा कि मेरे वंशज आपकी पूजा-आराधना करेंगे। मेरे वंशज दुनिया के किसी भी कोने में हों, प्रथम जात -जड़ुला आपके इसी स्थान पर आकर उतारेंगे। वैवाहिक कार्य में सबसे पहले आपका आव्हान किया जायेगा।
मान्यता है कि रानी केशर कुंवर के साथ पांच अन्य रानियां भी शक्ति हुई थी। उनके नाम इस तरह हैं :-
1.सोनी देवी (भांजा बहु)
2.परमी देवी
3. गुलाब बाई
4.मनेऊ बाई
5.छमु बाई
6. सुनी बाई
तब से गर्ग गोत्री दीवानजी के वंशज शारदीय नवरात्रि में नवमी के दिन महारकलां में आकर केशर माताजी के मन्दिर में रातिजगा करते हैं ,मेहँदी के थापे लगाते हैं। माता से अपने परिवार की कुशल मंगल के लिए मन्नत मांगते हैं व आशीर्वाद लेते हैं।अगले दिन दशहरे पर जड़ुले वाले बालकों के बाल उतारे जाते हैं।  बाल माताजी के स्थानक पर उतारने के पश्चात् बाल भांजा बहु के स्थानक जो पास में ही है, वहां चढ़ाये जाते हैं। फिर माताजी को घुघरी और कसार का भोग लगा कर प्रसाद ग्रहण किया जाता है। माता केशर देवी के स्थानक पर आकर जो कोई भी पूरी आस्था व श्रद्धा से मनौती मानता है, माता उसे अवश्य पूरा करती है।